ਝੂਮਰ, ਦੇਸ਼ ਪੰਜਾਬ ਦੀ ! Jhoomar, Country of Punjab !Rangla Bangla Fazilka
Get link
Facebook
X
Pinterest
Email
Other Apps
झूमर दक्षिण पंजाब का मशहूर लोक नाच है। भारत विभाजन हुआ तो सांदल बार के इलाके में रहने वाले अधिकांश लोग फाजिल्का और जलालाबाद के इलाके में आकर बस गए। जहां उन्होंने लोक नाच झूमर की शान को बरकरार रखा और देश विदेश में इसे प्रसिद्ध किया। दरअसल विभाजन से पूर्व झूमर में पोखर सिंह और जम्मू राम का नाम काबिले तारीफ रहा है। विभाजन के बाद जम्मू राम गांव नूरशाह में आकर बस गए, जबकि पोखर सिंह गांव झोटियां वाली में आकर रहने लगे। यहां उन्होंने चिराग ढ़ाणी बसाई। पोखर सिंह का जन्म 15 अगस्त 1914 को मिन्टगुमरी जिला के गांव तूतवाली जिला मिंटगुमरी (पाकिस्तान) में स. पंजाब सिंह के घर माता केसां बाई की कोख से हुआ। पोखर सिंह के छह भाई थे तो सबसे बड़ा लछमण सिंह पंजाब विधान सभा के सदस्य भी रहे। आप बचपन से कुश्ती और मुदगर उठाने के साथ-साथ आप झूमर के बहुत शौकीन थे। आपकी शादी संतो बाई से हुई और आपके घर चार बेटे व पांच बेटियों ने जन्म लिया। बाबा पोखर ङ्क्षसह की मौत के बाद उनके बेटे कुलवंत सिंह लोक नाच झूमर के जरिए इलाके की शान बनाए हुए हैं।
फाजिल्का में आने के बाद भी उन्होंने झूमर लोक नाच को प्रसिद्ध किया। बात 1967-68 की है। तब गांव लालो वाली के बेदी परिवार की ओर से भारी मेला लगाया जाता था और इसकी धूम दूरदराज के क्षेत्र में भी थी। स. लाजिन्द्र सिंह बेदी ने मेले में झूमर का मुकाबला करवाया। अन्य टीमें तो मुकाबले के पहले दौर में ही बाहर हो गई। मगर पोखर सिंह और जम्मू राम की टीम में कड़ा मुकाबला हुआ। मगर बाबा पोखर सिंह की टीम ने मुकाबला जीत लिया और उन्हें पुरस्कारों से नवाजा गया। कहते हैं कि जब महारानी विकटोरिया गोल्डन जुबली मनाने के लिए भारत आई तो बाबा पोखर सिंह ने झूमर में बोलियां डालकर उसका विरोध किया। पोखर सिंह ने विकटोरिया को जुगनी कहकर संबोधित किया। 26 जनवरी 1961 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने बाबा पोखर सिंह को सोने के तगमें से नवाजा। इसके अलावा आपने देश विदेश में अनेकों पुरस्कार हासिल किए। अब बात करते हैं झूमर की। पुरुषों द्वारा किया जाने वाला पंजाब झूमर नृत्य अविभाजित भारत के दक्षिणी पंजाब के शहर फाजिल्का का एक विशेष लोकनाच है। इसका यह नामकण झूम से लिया गया। घूमर नृत्य हरियाणा की युवतियों का लोकप्रिय नृत्य है, जो होली, गनगौर अथवा तीज जैसे त्यौहारों पर किया जाता है। घूमर नृत्य में जहां युवतियां, गोलाकार में झूमते हुये तालियां बजाकर एवं गीत गाते हुये यह नृत्य करती हैं। वहीं झूमर लोकनाच करने वाले गोलाकार घेरे में ढ़ोल की थाप पर झूमकर ताली बजाकर लगात्मकता के साथ लोकनाच करते हैं। झूमर के अंतिम चरण स्थिति में नर्तक दो-दो के जोड़े में तेजी से घूमते हैं। नृत्य के समय गाये जाने वाले गीतों में समसामयिक विषयों पर हास्य और व्यंग्य शामिल होता है।
फाजिल्का प्रसिद्ध झूम नृत्य के गीत लोकपारम्परिक काव्यों पर आधारित श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होते हैं। नर्तकों की वेषभूषा साधारणत्या सफेद होती है। यह लोकनाच तीन पड़ावों में होता हैं, एक धीमी ताल, दूसरा तेज ताल और तीसरा बहुत तेज ताल। कई विद्वानों ने इसे झूमर की ताल, चीना झडऩा और धमाल भी कहा हैं। यह लोक नाच खुली जगह, घेरे का आकार, अपने-अपने लोक गीत के बोल द्वारा ढ़ोल पर किया जाता है। इसकी शुरूआत धीमी और अंतिम में तेज व जोशीली होती है। इस दौरान जो भी गीत बोले जाते हैं। उनमें पशुओं, वृक्ष और प्रेमी के मिलने की तड़प का जिक्र ज्यादा होता हैं। (Lachhman Dost Fazilka)
Comments
Post a Comment